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सीमा पार ड्रग्स सिंडिकेट पर ED का बड़ा प्रहार: म्यांमार-बांग्लादेश बॉर्डर से जुड़े ₹142 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का पर्दाफाश


नई दिल्ली / आइजोल: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भारत की पूर्वी और उत्तर-पूर्वी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर सक्रिय एक बेहद संगठित और खतरनाक अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स सिंडिकेट के वित्तीय साम्राज्य को ध्वस्त करने के लिए एक बड़ा देशव्यापी अभियान शुरू किया है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने सोमवार को पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम के रणनीतिक सीमावर्ती इलाकों में एक साथ ताबड़तोड़ छापेमारी की।

यह पूरी कार्रवाई म्यांमार से भारत में तस्करी कर लाई जा रही सिंथेटिक ड्रग्स और उससे पैदा हुई ₹142 करोड़ से अधिक की काली कमाई (Proceeds of Crime) को वैध बनाने वाले नेटवर्क के खिलाफ केंद्रित है।

सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के सूत्रों के अनुसार, जिन ठिकानों पर छापेमारी की जा रही है, वे अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के बेहद करीब स्थित हैं। त्रिपुरा में तलाशी का एक स्थान बांग्लादेश सीमा से महज 200 मीटर की दूरी पर है, जबकि मिजोरम में लक्षित परिसर म्यांमार सीमा से सिर्फ 500 मीटर दूर है। यह भौगोलिक स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि सीमा पार से संचालित होने वाले इस ड्रग्स नेटवर्क की जड़ें कितनी गहरी और संवेदनशील हैं।

₹142 करोड़+
काली कमाई (Proceeds of Crime)
200 मीटर
बांग्लादेश सीमा से दूरी
500 मीटर
म्यांमार सीमा से दूरी

कार्रवाई की पृष्ठभूमि: 49 किलो ड्रग्स की जब्ती से खुली कड़ियां

इस बड़े वित्तीय अनुसंधान की शुरुआत पिछले साल एक जमीनी जब्ती से हुई थी। 21 अगस्त 2025 को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की अगरतला जोनल यूनिट ने एक खुफिया सूचना के आधार पर त्रिपुरा में जाल बिछाया था। उस ऑपरेशन में केंद्रीय कर्मियों ने 49.101 किलोग्राम अत्यधिक नशीली ‘मेथामफेटामाइन’ (Methamphetamine) टैबलेट और 40 ग्राम हेरोइन जब्त की थी।

मेथामफेटामाइन, जिसे आम बोलचाल में ‘आइस’ या ‘क्रिस्टल मेथ’ भी कहा जाता है, एक अत्यंत विनाशकारी सिंथेटिक ड्रग है। इसकी यह खेप पूर्वोत्तर राज्यों और मुख्य भूमि भारत के शहरी बाजारों में खपाई जानी थी।

एनसीभी की प्रारंभिक प्राथमिकी (FIR) के बाद, ईडी के आइजोल सब-जोनल कार्यालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 की आपराधिक धाराओं के तहत अपनी जांच शुरू की। ईडी का मुख्य उद्देश्य नशीले पदार्थों के इस भौतिक व्यापार के पीछे छिपे ‘मनी ट्रेल’ यानी पैसों के लेन-देन के गुप्त रास्तों को ढूंढना था।

49.101 किग्रा
मेथामफेटामाइन जब्त
40 ग्राम
हेरोइन जब्त
21 अगस्त 2025
एनसीबी ऑपरेशन की तिथि

म्यांमार से त्रिपुरा तक: कैसे काम करता था यह सिंडिकेट?

प्रवर्तन निदेशालय की प्रारंभिक जांच में एक बेहद व्यवस्थित और बहुस्तरीय तस्करी मार्ग का खुलासा हुआ है। इस सिंडिकेट ने सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देने के लिए भौगोलिक और राजनीतिक परिस्थितियों का फायदा उठाया।

[म्यांमार (उत्पादन केंद्र)] │ ▼ (अवैध सीमा पारगमन) [मिजोरम का चम्फाई / जोखावथर सेक्टर] │ ▼ (घरेलू परिवहन नेटवर्क) [त्रिपुरा (वितरण एवं प्राप्तकर्ता केंद्र)] │ ▼ (वित्तीय लेयरिंग) [पश्चिम बंगाल (शेल कंपनियां एवं फर्जी बैंक खाते)]

जांच के निष्कर्षों के अनुसार, नशीले पदार्थों को सबसे पहले म्यांमार से मिजोरम के चम्फाई जिले के जोखावथर सेक्टर के रास्ते भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कराया जाता था। जोखावथर सीमा अपनी कठिन भौगोलिक बनावट और घने जंगलों के कारण लंबे समय से तस्करों के निशाने पर रही है।

एक बार जब खेप मिजोरम में सुरक्षित रूप से पहुंच जाती थी, तो इसे स्थानीय कोरियर के माध्यम से त्रिपुरा में बैठे मुख्य प्राप्तकर्ताओं (रिसीवर्स) तक पहुँचाया जाता था। त्रिपुरा से इस अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स को बांग्लादेश और भारत के अन्य राज्यों में भेजने की योजना थी।

₹142 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग: शेल कंपनियों और फर्जी खातों का मायाजाल

इस अवैध व्यापार से प्राप्त होने वाले मुनाफे को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में शामिल करने के लिए सिंडिकेट ने एक जटिल वित्तीय चक्रव्यूह तैयार किया था। ईडी के अधिकारियों ने अब तक ₹142 करोड़ से अधिक की ऐसी राशि की पहचान की है, जिसे पूरी तरह से ‘लेयरिंग’ (Layering) के माध्यम से छुपाया गया था।

जांच अधिकारियों के मुताबिक, ड्रग्स की बिक्री से मिलने वाली नकदी को सीधे तौर पर मुख्य आरोपियों के खातों में जमा नहीं किया जाता था। इसके बजाय, पश्चिम बंगाल और अन्य व्यापारिक केंद्रों में पंजीकृत कई शेल (फर्जी) कंपनियों और बेनामी बैंक खातों का उपयोग किया गया।

नकदी का बिखराव: तस्करों से मिली नकदी को छोटे-छोटे हिस्सों में दर्जनों फर्जी मजदूरों और कम आय वाले व्यक्तियों के बैंक खातों में जमा कराया जाता था।

फर्जी व्यापारिक लेनदेन: इन खातों से पैसे को कथित व्यापारिक भुगतान के रूप में शेल कंपनियों के खातों में ट्रांसफर किया जाता था, ताकि यह वैध व्यापारिक कमाई जैसी दिखे।

अंतिम गंतव्य: अंततः इस पैसे को रियल एस्टेट संपत्तियों की खरीद और सीमा पार वैध दिखने वाले आयातों के वित्तपोषण में निवेश कर दिया जाता था।

सुरक्षा विश्लेषकों और कानून प्रवर्तन की नजरिया

इस कार्रवाई ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषकों और केंद्रीय खुफिया तंत्र के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक कानून-व्यवस्था या नशीले पदार्थों की तस्करी का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की संप्रभुता और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा विषय है।

“म्यांमार में जारी राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर वहां के विद्रोही समूह और आपराधिक सिंडिकेट भारत को सिंथेटिक ड्रग्स के लिए एक बड़े बाजार और पारगमन मार्ग के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इस अवैध व्यापार से होने वाली कमाई का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों और हथियारों की तस्करी में होने की पूरी आशंका रहती है।”

— के. सुब्रमण्यम, पूर्व सीमा सुरक्षा विशेषज्ञ और सामरिक विश्लेषक

दूसरी ओर, स्वतंत्र वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में बैंकिंग प्रणालियों और डिजिटल भुगतान की निगरानी को और अधिक कड़ा करने की आवश्यकता है।

प्रमुख तथ्य विवरण
कुल चिन्हित संदिग्ध राशि ₹142 करोड़ से अधिक
मुख्य जप्त नशीला पदार्थ 49.101 किग्रा मेथामफेटामाइन, 40 ग्राम हेरोइन
प्रभावित राज्य मिजोरम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल
अंतरराष्ट्रीय सीमा निकटता बांग्लादेश बॉर्डर (200 मीटर), म्यांमार बॉर्डर (500 मीटर)

आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: व्यापार बनाम सुरक्षा

इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग का प्रभाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता। पूर्वोत्तर राज्यों के स्थानीय व्यापारिक संघों ने चिंता व्यक्त की है कि सीमाओं पर अत्यधिक चौकसी और जांच के कारण वैध सीमा पार व्यापार प्रभावित होता है। मिजोरम और त्रिपुरा के स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि जोखावथर जैसे वैध व्यापारिक मार्गों पर सख्त चेकिंग से रोजमर्रा की वस्तुओं के आयात-निर्यात में देरी होती है。

हालांकि, समाजशास्त्रियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का दृष्टिकोण पूरी तरह से भिन्न है। उनका तर्क है कि मेथामफेटामाइन जैसी सिंथेटिक ड्रग्स पूर्वोत्तर की युवा पीढ़ी को भीतर से खोखला कर रही हैं। यदि इन सिंडिकेट्स के वित्तीय स्रोतों पर चोट नहीं की गई, तो केवल जमीनी स्तर पर ड्रग्स पकड़ने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। ईडी द्वारा ‘मनी ट्रेल’ पर किया गया यह प्रहार इस सिंडिकेट की रीढ़ की हड्डी तोड़ने जैसा है।

भविष्य का आउटलुक और आगामी चुनौतियां

आने वाले 12 से 24 महीनों में इस मामले के दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। प्रवर्तन निदेशालय वर्तमान में जप्त किए गए डिजिटल उपकरणों, मोबाइल फोन और बैंक दस्तावेजों के फॉरेंसिक विश्लेषण में जुटा है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल के कई हवाला ऑपरेटरों और कोलकाता स्थित वित्तीय मध्यस्थों की गिरफ्तारियां हो सकती हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, यह मामला भारत सरकार द्वारा म्यांमार और बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा वार्ताओं में प्रमुखता से उठाया जा सकता है। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) के मानकों के तहत, भारत को अपनी सीमाओं के भीतर से होने वाले इस प्रकार के ‘टेरर-फाइनेंसिंग’ और ‘ड्रग-लौंड्रिंग’ के गठजोड़ को पूरी तरह समाप्त करने की प्रतिबद्धता दिखानी होगी।

सोमवार को शुरू हुई यह तलाशी अभियान अभी भी जारी है, और अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि जैसे-जैसे बेनामी संपत्तियों के दस्तावेज सामने आएंगे, इस ₹142 करोड़ का आंकड़ा और अधिक बढ़ सकता है। केंद्रीय एजेंसियों का यह समन्वित रुख साफ करता है कि भारत अब अपनी सीमाओं पर वित्तीय और नशीले पदार्थों के इस संगठित अपराध को कतई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

Vikram Partap
Vikram Partap is a Senior Writer at The National Index, covering breaking news and in-depth analysis from across India and the world. He specialises in turning fast-moving developments into clear, well-sourced reporting, working closely with the editorial desk to ensure accuracy and context in every story.
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