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अफगानिस्तान के हिंदूकुश में ६.२ तीव्रता के भूकंप से हिला उत्तर भारत; दिल्ली-एनसीआर में सुरक्षा ऑडिट की मांग


विशेष समाचार फीचर
नई दिल्ली, 28 जून, 2026

उत्तर भारत के एक व्यापक भौगोलिक हिस्से में रविवार दोपहर को भूकंप के तेज और दीर्घकालिक झटके महसूस किए गए, जिससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली-एनसीआर), जम्मू-कश्मीर और पंजाब के मैदानी इलाकों में भारी दहशत फैल गई। भारतीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस भूकंपीय घटना का मुख्य केंद्र अफगानिस्तान के सुदूर और दुर्गम हिंदूकुश पर्वतीय क्षेत्र में जमीन से लगभग 190 किलोमीटर की गहराई पर स्थित था। रिक्टर पैमाने पर इस हलचल की तीव्रता 6.2 मापी गई, जो सीमा पार की टेक्टोनिक प्लेटों में हुए बड़े विस्थापन का सीधा परिणाम थी।

टेक्टोनिक प्लेटों का टकराव और गहरे फोकस का प्रभाव

हिंदूकुश क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से दुनिया के सबसे सक्रिय और जटिल भूकंपीय क्षेत्रों में से एक रहा है। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, यह विशिष्ट क्षेत्र भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच होने वाले निरंतर और तीव्र घर्षण का मुख्य बिंदु है। चूंकि भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ रही है और यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है, इसलिए इस टकराव क्षेत्र में भारी मात्रा में भू-गर्भीय तनाव (टेक्टोनिक स्ट्रेस) जमा हो जाता है। जब यह संचित तनाव अचानक चट्टानों के टूटने के रूप में मुक्त होता है, तो गहरे फोकस वाले भूकंप की उत्पत्ति होती है, जिसकी तरंगें महाद्वीप के आर-पार फैल जाती हैं।

इस विशिष्ट भूकंप की गहराई (190 किलोमीटर) ने इसकी विनाशकारी क्षमता को सीधे तौर पर प्रभावित किया। भू-विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, गहरे फोकस वाले भूकंपों की ऊर्जा सतह तक पहुंचते-पहुंचते एक बहुत बड़े क्षेत्र में फैल जाती है। यही कारण है कि केंद्र के पास विनाशकारी तीव्रता कम होने के बावजूद, इसके भूकंपीय झटके एक हजार किलोमीटर दूर स्थित नई दिल्ली और उसके आसपास के सैटेलाइट शहरों (नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद) तक स्पष्ट and तीव्र रूप से महसूस किए गए। यदि यही भूकंप 10 से 20 किलोमीटर की उथली गहराई पर आया होता, तो उपरिकेंद्र के आसपास की मानव बस्तियों में व्यापक जनहानि और संरचनात्मक विनाश तय था।

[हिंदूकुश भूकंपीय तरंग प्रोफाइल एवं प्रभाव सीमा]
रिक्टर पैमाना तीव्रता
6.2 Mw
भूकंप का उपरिकेंद्र (Epicenter)
हिंदूकुश पर्वत श्रृंखला (अफगानिस्तान)
गहराई (Focal Depth)
190 किलोमीटर (Deep-Focus Earthquake)
भारतीय उपमहाद्वीप में संवेदनशीलता जोन
जोन-4 (दिल्ली-एनसीआर), जोन-5 (कश्मीर)
परिचालन व्यवधान
मेट्रो सेवाओं में 15 मिनट का सुरक्षा ठहराव

भूकंपीय तरंगों के इस प्रसार प्रारूप को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में स्थापित सिस्मोमीटर के डेटा का विश्लेषण किया है। डेटा से पता चलता है कि झटके लगभग 30 से 40 सेकंड तक जारी रहे, जिसमें ‘एस-वेव्स’ (सेकेंडरी वेव्स) का प्रभाव अधिक था। इन तरंगों के कारण बहुमंजिला इमारतों में एक विशिष्ट प्रकार का कोणीय दोलन (एंगुलर ऑसिलेशन) उत्पन्न हुआ, जो ऊपरी मंजिलों पर रहने वाले लोगों को अधिक तीव्रता से महसूस होता है। इस भू-गर्भीय घटना ने स्थानीय मौसम विज्ञानियों को दिल्ली की फॉल्ट लाइनों की संवेदनशीलता का पुनर्मूल्यांकन करने पर मजबूर कर दिया है。

दिल्ली-एनसीआर का ढांचागत संकट और जोन-4 की संवेदनशीलता

भूकंप के झटके आते ही दिल्ली-एनसीआर के ऊंचे आवासीय टावरों में रह रहे नागरिकों के बीच अफरा-तफरी मच गई। गगनचुंबी इमारतों के ऊपरी तलों पर रहने वाले लोगों ने लंबी अवधि तक दोलनों (स्विंग) का अनुभव किया, जिसके कारण सोसायटियों के सुरक्षा अलार्म बज उठे और लोग लिफ्ट का उपयोग न करते हुए सीढ़ियों के रास्ते खुले मैदानों की ओर भागे। हालांकि प्रारंभिक रिपोर्टों में किसी बड़े ढांचे के गिरने या किसी नागरिक के हताहत होने की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस घटना ने राजधानी क्षेत्र के अनियोजित शहरीकरण और ऊंची इमारतों की कमजोरियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के संरचनात्मक इंजीनियरों ने बार-बार चेतावनी दी है कि दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा, विशेष रूप से यमुना नदी के कछार (फ्लडप्लेन) पर बसी सघन कॉलोनियां, उच्च भूकंपीय जोखिम वाले ‘जोन-4’ के अंतर्गत आती हैं। इन क्षेत्रों में निर्मित बहुमंजिला इमारतों में से अधिकांश ‘सॉइल लिक्विफैक्शन’ (भूकंप के दौरान मिट्टी का दलदल में बदलना) के खतरों के प्रति संवेदनशील हैं। इसके अतिरिक्त, पुरानी और अनधिकृत निर्माण वाली संपत्तियों में ‘भूकंप प्रतिरोधी संरचनात्मक कोड’ (IS 1893:2016) का पालन बिल्कुल नहीं किया गया है, जो किसी भी भावी उथले भूकंप की स्थिति में बड़े पैमाने पर मलबे के ढेर में बदल सकती हैं, जिससे बचाव कार्य भी बाधित होगा।

“यह भूकंप हमारे शहरी प्रशासन के लिए प्रकृति की एक और चेतावनी है। हम गहरे फोकस वाले भूकंपों के कारण बार-बार बच रहे हैं, लेकिन यदि दिल्ली के समीप किसी फॉल्ट लाइन पर उथला भूकंप आता है, तो हमारी वर्तमान संरचनाएं उसे झेलने में सक्षम नहीं हैं।”

— नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के वरिष्ठ निदेशक का तकनीकी वक्तव्य

समस्या केवल अनधिकृत कॉलोनियों तक सीमित नहीं है; आधुनिक गगनचुंबी सोसायटियों में भी संरचनात्मक सुरक्षा मानकों की अनदेखी के मामले सामने आए हैं। कई डेवलपर्स ने लागत कम करने के लिए कंक्रीट की गुणवत्ता और स्टील सुदृढ़ीकरण (स्टील रीइन्फोर्समेंट) के मानकों में कटौती की है। इस भूकंप के बाद नोएडा और गुरुग्राम की कई ऊंची सोसायटियों की दीवारों और पिलर बेस में बारीक दरारें देखी गई हैं, जिससे निवासियों में अपने आशियाने की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। स्थानीय नागरिक निकायों से इन दरारों की तकनीकी जांच कराने की मांग तेजी से उठ रही है।

आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणालियों का सुरक्षा ऑडिट

इस भू-गर्भीय घटना के दौरान सार्वजनिक परिवहन और आपातकालीन प्रणालियों ने अपनी स्थापित सुरक्षा प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन किया। दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने झटके महसूस होते ही अपनी सभी लाइनों पर ट्रेनों को अगले स्टेशन पर रोक दिया। सुरक्षा टीमों ने पटरियों की ज्यामिति और ओवरहेड बिजली तारों (OHE) की त्वरित भौतिक जांच की। लगभग पंद्रह मिनट के इस सुरक्षा ठहराव के बाद, जब यह सुनिश्चित हो गया कि बुनियादी ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है, तब ट्रेनों का परिचालन धीमी गति से दोबारा शुरू किया गया, जिससे यात्रियों को थोड़ी असुविधा तो हुई लेकिन सुरक्षा सुनिश्चित रही।

प्रभावित क्षेत्र अनुभव की गई झटकों की अवधि प्राथमिक संरचनात्मक प्रतिक्रिया नागरिक सुरक्षा उपाय
जम्मू-कश्मीर लगभग 40 सेकंड पुरानी लकड़ी-ईंट की इमारतों में दरारें खुले मैदानों और सड़कों पर जमाव
नई दिल्ली (NCR) लगभग 25 सेकंड बहुमंजिला टावरों में दृश्य दोलन (स्विंग) आपातकालीन सीढ़ियों का त्वरित उपयोग
अमृतसर (पंजाब) लगभग 30 सेकंड छत के पंखे और खिड़कियों का हिलना व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से बाहर निकलना

इसी तरह, इंदिरा घाटी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGI) के एप्रन और रनवे क्षेत्र का हवाई अड्डा प्राधिकरण द्वारा तत्काल निरीक्षण किया गया। विमानों के सुचारू संचालन में कोई बाधा नहीं पाई गई और उड़ानों का आवागमन सामान्य रूप से जारी रहा। हालांकि, इस घटना ने हवाई अड्डे के आपातकालीन नियंत्रण कक्षों की प्रतिक्रिया गति का एक व्यावहारिक परीक्षण कर दिया। आपदा प्रबंधन टीमों को अगले चौबीस घंटों के लिए हाई अलर्ट पर रखा गया है ताकि किसी भी संभावित आफ्टरशॉक (मुख्य भूकंप के बाद के झटके) से तुरंत निपटा जा सके, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा भी बढ़ जाता है।

आपदा प्रबंधन की वैश्विक और क्षेत्रीय चुनौतियाँ

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भूकंप के केंद्र अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत और पड़ोसी पाकिस्तान के खैबर पख्तुनख्वा के पहाड़ी इलाकों में अधिक नुकसान की आशंका है। इन सुदूर क्षेत्रों में संचार नेटवर्क ठप होने के कारण वास्तविक नुकसान का आकलन करने में समय लग रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वह काबुल और इस्लामाबाद में स्थित अपने मिशनों के माध्यम से स्थिति पर बारीक नजर बनाए हुए है। भारत ने आपदा राहत बलों (NDRF) को भी तैयार रहने को कहा है ताकि आवश्यकता पड़ने पर पड़ोसी देशों को मानवीय सहायता और तकनीकी रेस्क्यू सपोर्ट तुरंत भेजा जा सके।

आगे की राह को देखते हुए, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सभी सरकारी और निजी आवासीय परिसरों का एक व्यापक और अनिवार्य ‘स्ट्रक्चरल हेल्थ ऑडिट’ कराया जाना चाहिए। जिन इमारतों में ढांचागत कमजोरी पाई जाए, उन्हें आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों (जैसे बेस आइसोलेशन और डैम्पर्स) के माध्यम से रेट्रोफिट किया जाना अनिवार्य होना चाहिए। स्थानीय निकायों को निर्माण अनुमति देने की प्रक्रियाओं में कड़ाई बरतनी होगी ताकि भविष्य के कंक्रीट के ढांचे किसी भी भूकंपीय विभीषिका को झेलने के लिए पूरी तरह सक्षम हों और जनहानि को न्यूनतम किया जा सके।

Vikram Partap
Vikram Partap is a Senior Writer at The National Index, covering breaking news and in-depth analysis from across India and the world. He specialises in turning fast-moving developments into clear, well-sourced reporting, working closely with the editorial desk to ensure accuracy and context in every story.
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